JSW-Skoda Volkswagen India JV: 51:49 साझेदारी से क्या बदलेगा?

Skoda Volkswagen JV

Skoda Volkswagen JV: क्या आप जानते हैं कि आज की तारीख में भारत की सड़कों पर हर महीने जितनी नई गाड़ियां निकलती हैं, उनमें से एक प्रतिशत से भी कम गाड़ियों पर स्कोडा या फॉक्सवैगन का बैज होता है। अब जब जेएसडब्ल्यू ग्रुप ने इसी हफ्ते स्कोडा ऑटो वोक्सवैगन इंडिया के साथ 51:49 के अनुपात में संयुक्त उद्यम बनाने की गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि क्या यह साझेदारी सिर्फ कागजी कार्रवाई है या फिर इसका सीधा असर आपकी जेब और आपके अगले कार खरीदने के फैसले पर पड़ेगा।

इस डील को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि जेएसडब्ल्यू ग्रुप सिर्फ पैसा लगा रहा है, जबकि तकनीक, उत्पादन और उत्पादों का पूरा अधिकार अभी भी फॉक्सवैगन के पास ही रहेगा। यानी कि जेएसडब्ल्यू को 51 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलेगी, लेकिन कारों के डिजाइन, इंजन और प्लेटफॉर्म पर उनका कोई नियंत्रण नहीं होगा। यह वही मॉडल है जो पहले महिंद्रा और फोर्ड के बीच देखने को मिला था, जो आखिरकार सफल नहीं हो पाया।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर जेएसडब्ल्यू को इस डील में ऐसा क्या दिखा जो उन्होंने अपने पैसे इस कंपनी में लगाने का फैसला किया। दरअसल, जेएसडब्ल्यू ग्रुप का मुख्य कारोबार स्टील और ऊर्जा क्षेत्र में है, और वे ऑटोमोबाइल क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन सच यह है कि फॉक्सवैगन इंडिया की बाजार हिस्सेदारी पिछले कई सालों से एक प्रतिशत से भी कम है, और सिर्फ पैसा लगाने से यह आंकड़ा अपने आप नहीं बढ़ने वाला है।

क्या बदलेगा आम खरीदार के लिए?

Skoda Volkswagen JV design

अगर आप स्कोडा या फॉक्सवैगन की कोई गाड़ी खरीदने की सोच रहे हैं, तो सबसे पहले यह समझ लीजिए कि इस जेवी के तहत आने वाले छह महीनों में कोई नई कार लॉन्च नहीं होगी। कंपनी के पास अभी जो मॉडल लाइनअप है, जैसे कि स्कोडा स्लाविया, कुशाक और फॉक्सवैगन वर्टस, वही आगे भी बिकते रहेंगे। जो लोग यह सोच रहे हैं कि जेएसडब्ल्यू के आने से कीमतों में भारी कटौती होगी या फिर कोई नया किफायती मॉडल आएगा, उन्हें निराशा हाथ लग सकती है।

हालांकि, एक अच्छी खबर यह है कि जेएसडब्ल्यू के पास देश भर में फैला हुआ अपना नेटवर्क है, जिसका इस्तेमाल स्कोडा और फॉक्सवैगन की सर्विस और बिक्री बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में छोटे शहरों में भी स्कोडा और फॉक्सवैगन के शोरूम और सर्विस सेंटर खुल सकते हैं। अगर आप किसी छोटे शहर में रहते हैं और स्कोडा की गाड़ी खरीदना चाहते हैं, तो यह आपके लिए एक अच्छी खबर हो सकती है, क्योंकि अभी इन कारों की सर्विस के लिए आपको बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।

फॉक्सवैगन की भारत में असली कमजोरी

फॉक्सवैगन की भारत में सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि उनके पास पैसा नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि उन्होंने भारतीय बाजार के हिसाब से अपने उत्पादों को स्थानीय नहीं बनाया है। जहां हुंडई और मारुति सुजुकी ने भारतीय सड़कों की हकीकत को समझकर अपनी कारों को डिजाइन किया, वहीं फॉक्सवैगन ने हमेशा अपनी ग्लोबल कारों को भारत में उतारने की कोशिश की। इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी कारों की सर्विसिंग लागत अधिक रही और छोटी-मोटी खराबी पर भी भारी-भरकम बिल आया।

अब जेएसडब्ल्यू के आने से यह समस्या अपने आप हल नहीं हो जाएगी, क्योंकि उत्पाद विकास का अधिकार अभी भी जर्मन कंपनी के पास है। जब तक फॉक्सवैगन यह नहीं समझेगा कि भारतीय खरीदार को सिर्फ जर्मन इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि किफायती स्पेयर पार्ट्स और कम मेंटेनेंस वाली कार चाहिए, तब तक यह जेवी भी सिर्फ एक कागजी सौदा बनकर रह जाएगा। यह वही गलती है जो फॉक्सवैगन ने पिछले दो दशकों में कई बार दोहराई है, और इसका खामियाजा उन्हें बाजार हिस्सेदारी के रूप में भुगतना पड़ा है।

रिसेल वैल्यू और लॉन्ग टर्म स्थिरता का सच

अगर आप पहले से स्कोडा या फॉक्सवैगन की गाड़ी चला रहे हैं, तो आपके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस जेवी का असर आपकी गाड़ी की रिसेल वैल्यू पर पड़ेगा। सच यह है कि इस घोषणा के तुरंत बाद बाजार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा, लेकिन लंबे समय में अगर यह जेवी सफल रहती है और कंपनी का नेटवर्क बढ़ता है, तो इससे इन कारों की रिसेल वैल्यू को स्थिरता मिल सकती है। फिलहाल, इन ब्रांड्स की कारों की रिसेल वैल्यू हुंडई और मारुति के मुकाबले काफी कम है, और यही वजह है कि कई खरीदार इन्हें खरीदने से कतराते हैं।

लेकिन यहां एक और सच यह है कि जो लोग इन कारों को खरीदते हैं, वे आमतौर पर लंबे समय तक इन्हें रखते हैं और ड्राइविंग अनुभव को सबसे ज्यादा तवज्जो देते हैं। अगर आप ऐसे ही खरीदार हैं, जो सिर्फ रिसेल वैल्यू के लिए गाड़ी नहीं खरीदते, बल्कि ड्राइविंग का मजा लेना चाहते हैं, तो स्कोडा और फॉक्सवैगन की कारें आज भी बाजार में सबसे अच्छे विकल्पों में से एक हैं। इस जेवी का फायदा आपको लंबे समय में सर्विस नेटवर्क के विस्तार के रूप में देखने को मिल सकता है, लेकिन इसके लिए आपको कम से कम दो से तीन साल का इंतजार करना होगा।

फैसला: किसे खरीदनी चाहिए और किसे नहीं?

अगर आप एक ऐसे खरीदार हैं जो अपनी गाड़ी को सिर्फ एक साधन नहीं, बल्कि एक जुनून के तौर पर देखते हैं, और ड्राइविंग का असली आनंद लेना चाहते हैं, तो स्कोडा और फॉक्सवैगन की मौजूदा कारें आपको निराश नहीं करेंगी। इन कारों का राइडिंग अनुभव, स्टीयरिंग फील और बिल्ड क्वालिटी आज भी अपने सेगमेंट में सबसे बेहतर है, और यह जेवी आने वाले समय में इन्हें और मजबूत कर सकती है। लेकिन अगर आप ऐसे खरीदार हैं जो सबसे पहले रिसेल वैल्यू, कम मेंटेनेंस और आसान सर्विस को ध्यान में रखते हैं, तो आपको हुंडई या मारुति की ओर ही देखना चाहिए।

इस जेवी से तत्काल कोई चमत्कार की उम्मीद न करें, क्योंकि फॉक्सवैगन की भारत में समस्याएं सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि मानसिकता की हैं। जब तक वे भारतीय बाजार के लिए खास तौर पर कारें नहीं बनाएंगे और अपने स्पेयर पार्ट्स की कीमतों को कम नहीं करेंगे, तब तक यह गठबंधन भी सिर्फ एक कॉर्पोरेट खबर बनकर रह जाएगा। अगर आप अभी इन ब्रांड्स की कार खरीदने का सोच रहे हैं, तो अपनी जरूरतों को ध्यान से समझिए और सिर्फ इस उम्मीद में खरीदारी मत कीजिए कि जेएसडब्ल्यू के आने से सब कुछ बदल जाएगा।

Scroll to Top